संपादकीय हर वर्ष हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा और हिंदी माह के आयोजन होते हैं। गोष्ठियाँ होती हैं, प्रतियोगिताएँ होती हैं, पुरस्क...
संपादकीय
हर वर्ष हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा और हिंदी माह के आयोजन होते हैं। गोष्ठियाँ होती हैं, प्रतियोगिताएँ होती हैं, पुरस्कार दिए जाते हैं और हिंदी के महत्व पर भाषण होते हैं। लेकिन इन औपचारिक आयोजनों के बीच कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जो हिंदी के भविष्य से कहीं अधिक गंभीरता से जुड़े हैं। ये प्रश्न हिंदी के साहित्यिक अस्तित्व के नहीं, बल्कि हिंदी के तकनीकी, प्रशासनिक और डिजिटल अस्तित्व के हैं।
आज का नागरिक बैंकिंग से लेकर कर भुगतान तक, वाहन पंजीकरण से लेकर सरकारी आवेदन तक और शिक्षा से लेकर डिजिटल पहचान तक—लगभग हर क्षेत्र में कंप्यूटर और इंटरनेट पर निर्भर है। ऐसे में यदि हिंदी किसी वेबसाइट पर दिखाई तो दे, लेकिन उसमें नागरिक अपना डेटा हिंदी में भर न सके; यदि सरकारी सूचना हिंदी में पढ़ी जा सके, लेकिन उसका डिजिटल रिकॉर्ड केवल अंग्रेजी में बनाया जा सके, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह भाषाई समानता कितनी वास्तविक है?
यही वे दस यक्ष प्रश्न हैं, जिन पर हिंदी दिवस 2026 के अवसर पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
वाहन का पंजीकरण नंबर हो, GSTIN हो या PAN—इनमें रोमन वर्णमाला और अंकों की व्यवस्था दिखाई देती है। इसके पीछे तकनीकी मानकीकरण, अंतर-संचालनीयता, पुराने डेटाबेस और राष्ट्रीय स्तर की एकरूपता जैसे व्यावहारिक कारण हो सकते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या तकनीकी मानकीकरण का अर्थ भारतीय लिपियों की स्थायी अनुपस्थिति होना चाहिए? क्या भविष्य में ऐसी व्यवस्था विकसित नहीं की जा सकती, जिसमें भारतीय भाषाओं और लिपियों को भी तकनीकी रूप से समान सम्मान मिले?
यहाँ यह अंतर समझना आवश्यक है कि H₂O, CO₂, x, y, +, −, = जैसे वैज्ञानिक और गणितीय संकेत किसी भाषा की संपत्ति नहीं हैं। वे अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संकेत-पद्धति का हिस्सा हैं। समस्या इन संकेतों के अंग्रेजी होने की नहीं, बल्कि उनके अर्थ, व्याख्या, शिक्षण, डिजिटल इनपुट और उपयोगकर्ता-अनुभव को भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने की है।
रसायन विज्ञान और बीजगणित इसका अच्छा उदाहरण हैं। विद्यार्थी हिंदी में प्रश्न समझ सकता है, हिंदी में उत्तर लिख सकता है, लेकिन वैज्ञानिक और गणितीय डिजिटल प्रणालियाँ अक्सर अंग्रेजी-केंद्रित होती हैं। यदि भारत को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था बनना है तो भारतीय भाषाओं को केवल साहित्य और सामान्य संचार तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, गणित, चिकित्सा, वित्त और कृत्रिम बुद्धिमत्ता—हर क्षेत्र में भारतीय भाषाओं की कार्यक्षमता विकसित करनी होगी।
डाकघर का उदाहरण भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। नागरिक लिफाफे पर पता देवनागरी या अन्य भारतीय लिपि में लिख सकता है, लेकिन सेवा से संबंधित डिजिटल रसीद या विवरण अंग्रेजी-केंद्रित हो सकता है। इसी प्रकार अनेक सरकारी वेबसाइटों पर भाषा का विकल्प तो दिखाई देता है, लेकिन फॉर्म के वास्तविक डेटा-एंट्री क्षेत्र में भारतीय भाषा का पूर्ण समर्थन नहीं मिलता। अर्थात् अनुवादित इंटरफेस उपलब्ध है, पर भारतीय भाषा में वास्तविक डिजिटल कामकाज अभी भी अधूरा है।
CAPTCHA और पासवर्ड की समस्या भी इसी व्यापक तकनीकी अंतर की ओर संकेत करती है। हर मामले में भारतीय लिपियों को स्वीकार करना सुरक्षा या तकनीकी दृष्टि से उचित होगा, यह आवश्यक नहीं है। पासवर्ड प्रणाली में सुरक्षा, Unicode normalization, interoperability और legacy systems जैसे प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। लेकिन प्रश्न यह अवश्य है कि क्या जहाँ तकनीकी रूप से सुरक्षित और व्यवहार्य विकल्प उपलब्ध हैं, वहाँ भारतीय भाषाओं को अनावश्यक रूप से बाहर रखा जाना चाहिए?
इसी प्रकार शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का प्रश्न है। जिस विद्यार्थी ने हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा में शिक्षा प्राप्त की है, उसकी उपलब्धि का प्रमाणपत्र केवल अंग्रेजी में क्यों हो? द्विभाषी प्रमाणपत्र—भारतीय भाषा के साथ अंग्रेजी— न केवल विद्यार्थी के भाषाई अधिकार को मजबूत कर सकता है, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उपयोग की आवश्यकता को भी पूरा कर सकता है।
इन प्रश्नों का संबंध केवल हिंदी से नहीं है। यह भारत की सभी भारतीय भाषाओं का प्रश्न है। देवनागरी, गुरुमुखी, बंगाली, गुजराती, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, ओड़िया, असमिया और अन्य भारतीय लिपियों को डिजिटल युग में समान अवसर मिलना चाहिए। हिंदी के नाम पर अंग्रेजी का विरोध करना समाधान नहीं है; वास्तविक समाधान है—भारतीय भाषाओं की तकनीकी क्षमता को अंग्रेजी के समान सक्षम बनाना।
यहीं रघुवीर सहाय की भाषा-दृष्टि आज नए संदर्भ में प्रासंगिक दिखाई देती है। उनका प्रश्न केवल यह नहीं था कि हिंदी बोली या लिखी कितनी जाती है; प्रश्न यह भी था कि सत्ता, समाज और आधुनिक जीवन में उसका वास्तविक स्थान क्या है। आज उसी प्रश्न को डिजिटल युग में आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
आज हमें यह पूछना चाहिए—
क्या हिंदी केवल हिंदी दिवस की भाषा है, या डिजिटल भारत की कार्यभाषा भी बन सकती है?
यदि नागरिक हिंदी में सरकारी सूचना पढ़ सकता है, तो वह हिंदी में सरकारी फॉर्म भर क्यों न सके? यदि बैंकिंग एप हिंदी में उपलब्ध है, तो उसकी सभी आवश्यक प्रक्रियाएँ हिंदी में क्यों न पूरी की जा सकें? यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता हिंदी को समझ सकती है, तो सरकारी डेटाबेस हिंदी को मूल डेटा के रूप में क्यों न स्वीकार करें?
इस दिशा में समाधान केवल सरकारी आदेशों से नहीं आएगा। इसके लिए Unicode मानकीकरण, भारतीय भाषा NLP, OCR, speech-to-text, text-to-speech, मशीन अनुवाद, भारतीय भाषा डेटाबेस, स्थानीयकृत सॉफ्टवेयर, बहुभाषी APIs और भारतीय भाषाओं के लिए खुले डिजिटल मानकों का विकास आवश्यक है।
हिंदी दिवस 2026 को इसलिए केवल समारोह का अवसर न बनाया जाए। इसे एक तकनीकी संकल्प दिवस बनाया जा सकता है।
संकल्प यह हो कि—
“जहाँ तकनीकी रूप से संभव हो, वहाँ नागरिक को भारतीय भाषा में केवल सूचना देखने ही नहीं, बल्कि डिजिटल रूप से काम करने का भी अधिकार मिले।”
यह अधिकार केवल हिंदी का नहीं, प्रत्येक भारतीय भाषा का हो।
भाषा तभी जीवित और शक्तिशाली होती है जब वह घर और साहित्य से निकलकर कार्यालय, प्रयोगशाला, बैंक, न्यायालय, विद्यालय, कंप्यूटर और मोबाइल तक पहुँचती है।
इसलिए हिंदी दिवस का सबसे बड़ा प्रश्न शायद यही है—
“क्या हम हिंदी को मनाने से आगे बढ़कर हिंदी में काम करने की तकनीकी स्वतंत्रता देंगे?”
इन दस यक्ष प्रश्नों का उत्तर भाषणों में नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की डिजिटल नीतियों, सॉफ्टवेयरों और नागरिक सेवाओं में दिखाई देना चाहिए।
यही हिंदी दिवस 2026 की वास्तविक सार्थकता होगी।
हर वर्ष हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा और हिंदी माह के आयोजन होते हैं। गोष्ठियाँ होती हैं, प्रतियोगिताएँ होती हैं, पुरस्कार दिए जाते हैं और हिंदी के महत्व पर भाषण होते हैं। लेकिन इन औपचारिक आयोजनों के बीच कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जो हिंदी के भविष्य से कहीं अधिक गंभीरता से जुड़े हैं। ये प्रश्न हिंदी के साहित्यिक अस्तित्व के नहीं, बल्कि हिंदी के तकनीकी, प्रशासनिक और डिजिटल अस्तित्व के हैं।
आज का नागरिक बैंकिंग से लेकर कर भुगतान तक, वाहन पंजीकरण से लेकर सरकारी आवेदन तक और शिक्षा से लेकर डिजिटल पहचान तक—लगभग हर क्षेत्र में कंप्यूटर और इंटरनेट पर निर्भर है। ऐसे में यदि हिंदी किसी वेबसाइट पर दिखाई तो दे, लेकिन उसमें नागरिक अपना डेटा हिंदी में भर न सके; यदि सरकारी सूचना हिंदी में पढ़ी जा सके, लेकिन उसका डिजिटल रिकॉर्ड केवल अंग्रेजी में बनाया जा सके, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह भाषाई समानता कितनी वास्तविक है?
यही वे दस यक्ष प्रश्न हैं, जिन पर हिंदी दिवस 2026 के अवसर पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
वाहन का पंजीकरण नंबर हो, GSTIN हो या PAN—इनमें रोमन वर्णमाला और अंकों की व्यवस्था दिखाई देती है। इसके पीछे तकनीकी मानकीकरण, अंतर-संचालनीयता, पुराने डेटाबेस और राष्ट्रीय स्तर की एकरूपता जैसे व्यावहारिक कारण हो सकते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या तकनीकी मानकीकरण का अर्थ भारतीय लिपियों की स्थायी अनुपस्थिति होना चाहिए? क्या भविष्य में ऐसी व्यवस्था विकसित नहीं की जा सकती, जिसमें भारतीय भाषाओं और लिपियों को भी तकनीकी रूप से समान सम्मान मिले?
यहाँ यह अंतर समझना आवश्यक है कि H₂O, CO₂, x, y, +, −, = जैसे वैज्ञानिक और गणितीय संकेत किसी भाषा की संपत्ति नहीं हैं। वे अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संकेत-पद्धति का हिस्सा हैं। समस्या इन संकेतों के अंग्रेजी होने की नहीं, बल्कि उनके अर्थ, व्याख्या, शिक्षण, डिजिटल इनपुट और उपयोगकर्ता-अनुभव को भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने की है।
रसायन विज्ञान और बीजगणित इसका अच्छा उदाहरण हैं। विद्यार्थी हिंदी में प्रश्न समझ सकता है, हिंदी में उत्तर लिख सकता है, लेकिन वैज्ञानिक और गणितीय डिजिटल प्रणालियाँ अक्सर अंग्रेजी-केंद्रित होती हैं। यदि भारत को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था बनना है तो भारतीय भाषाओं को केवल साहित्य और सामान्य संचार तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, गणित, चिकित्सा, वित्त और कृत्रिम बुद्धिमत्ता—हर क्षेत्र में भारतीय भाषाओं की कार्यक्षमता विकसित करनी होगी।
डाकघर का उदाहरण भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। नागरिक लिफाफे पर पता देवनागरी या अन्य भारतीय लिपि में लिख सकता है, लेकिन सेवा से संबंधित डिजिटल रसीद या विवरण अंग्रेजी-केंद्रित हो सकता है। इसी प्रकार अनेक सरकारी वेबसाइटों पर भाषा का विकल्प तो दिखाई देता है, लेकिन फॉर्म के वास्तविक डेटा-एंट्री क्षेत्र में भारतीय भाषा का पूर्ण समर्थन नहीं मिलता। अर्थात् अनुवादित इंटरफेस उपलब्ध है, पर भारतीय भाषा में वास्तविक डिजिटल कामकाज अभी भी अधूरा है।
CAPTCHA और पासवर्ड की समस्या भी इसी व्यापक तकनीकी अंतर की ओर संकेत करती है। हर मामले में भारतीय लिपियों को स्वीकार करना सुरक्षा या तकनीकी दृष्टि से उचित होगा, यह आवश्यक नहीं है। पासवर्ड प्रणाली में सुरक्षा, Unicode normalization, interoperability और legacy systems जैसे प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। लेकिन प्रश्न यह अवश्य है कि क्या जहाँ तकनीकी रूप से सुरक्षित और व्यवहार्य विकल्प उपलब्ध हैं, वहाँ भारतीय भाषाओं को अनावश्यक रूप से बाहर रखा जाना चाहिए?
इसी प्रकार शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का प्रश्न है। जिस विद्यार्थी ने हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा में शिक्षा प्राप्त की है, उसकी उपलब्धि का प्रमाणपत्र केवल अंग्रेजी में क्यों हो? द्विभाषी प्रमाणपत्र—भारतीय भाषा के साथ अंग्रेजी— न केवल विद्यार्थी के भाषाई अधिकार को मजबूत कर सकता है, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उपयोग की आवश्यकता को भी पूरा कर सकता है।
इन प्रश्नों का संबंध केवल हिंदी से नहीं है। यह भारत की सभी भारतीय भाषाओं का प्रश्न है। देवनागरी, गुरुमुखी, बंगाली, गुजराती, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, ओड़िया, असमिया और अन्य भारतीय लिपियों को डिजिटल युग में समान अवसर मिलना चाहिए। हिंदी के नाम पर अंग्रेजी का विरोध करना समाधान नहीं है; वास्तविक समाधान है—भारतीय भाषाओं की तकनीकी क्षमता को अंग्रेजी के समान सक्षम बनाना।
यहीं रघुवीर सहाय की भाषा-दृष्टि आज नए संदर्भ में प्रासंगिक दिखाई देती है। उनका प्रश्न केवल यह नहीं था कि हिंदी बोली या लिखी कितनी जाती है; प्रश्न यह भी था कि सत्ता, समाज और आधुनिक जीवन में उसका वास्तविक स्थान क्या है। आज उसी प्रश्न को डिजिटल युग में आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
आज हमें यह पूछना चाहिए—
क्या हिंदी केवल हिंदी दिवस की भाषा है, या डिजिटल भारत की कार्यभाषा भी बन सकती है?
यदि नागरिक हिंदी में सरकारी सूचना पढ़ सकता है, तो वह हिंदी में सरकारी फॉर्म भर क्यों न सके? यदि बैंकिंग एप हिंदी में उपलब्ध है, तो उसकी सभी आवश्यक प्रक्रियाएँ हिंदी में क्यों न पूरी की जा सकें? यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता हिंदी को समझ सकती है, तो सरकारी डेटाबेस हिंदी को मूल डेटा के रूप में क्यों न स्वीकार करें?
इस दिशा में समाधान केवल सरकारी आदेशों से नहीं आएगा। इसके लिए Unicode मानकीकरण, भारतीय भाषा NLP, OCR, speech-to-text, text-to-speech, मशीन अनुवाद, भारतीय भाषा डेटाबेस, स्थानीयकृत सॉफ्टवेयर, बहुभाषी APIs और भारतीय भाषाओं के लिए खुले डिजिटल मानकों का विकास आवश्यक है।
हिंदी दिवस 2026 को इसलिए केवल समारोह का अवसर न बनाया जाए। इसे एक तकनीकी संकल्प दिवस बनाया जा सकता है।
संकल्प यह हो कि—
“जहाँ तकनीकी रूप से संभव हो, वहाँ नागरिक को भारतीय भाषा में केवल सूचना देखने ही नहीं, बल्कि डिजिटल रूप से काम करने का भी अधिकार मिले।”
यह अधिकार केवल हिंदी का नहीं, प्रत्येक भारतीय भाषा का हो।
भाषा तभी जीवित और शक्तिशाली होती है जब वह घर और साहित्य से निकलकर कार्यालय, प्रयोगशाला, बैंक, न्यायालय, विद्यालय, कंप्यूटर और मोबाइल तक पहुँचती है।
इसलिए हिंदी दिवस का सबसे बड़ा प्रश्न शायद यही है—
“क्या हम हिंदी को मनाने से आगे बढ़कर हिंदी में काम करने की तकनीकी स्वतंत्रता देंगे?”
इन दस यक्ष प्रश्नों का उत्तर भाषणों में नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की डिजिटल नीतियों, सॉफ्टवेयरों और नागरिक सेवाओं में दिखाई देना चाहिए।
यही हिंदी दिवस 2026 की वास्तविक सार्थकता होगी।
- डॉ राहुल खटे,
- राजभाषा अधिकारी, अमरावती.


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