*श्री हजूर साहिब का विलक्षण होला महल्ला - डॉ. विजय सतबीर सिंघ*

होला महल्ला मनाने की आरंभता दसवें पातशाह साहिब श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी महाराज ने सन 1700 ई. के आस-पास श्री आनंदपुर साहिब में की थी। 'होला' अरबी भाषा के शब्द 'हुल' से अस्तित्व में आया है। जिसके अर्थ शुभ कर्म के लिए आगे आना, शुभ नेक कर्म के लिए जुझना और शीश को हथेली पर रखकर लड़ना आदि किए गए। यह होली के त्यौहार के एक दिन बाद मनाया जाता है। 

श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी महाराज ने देश के मूल निवासियों को अपने अस्तित्व का एहसास दिलाने और किसी भी प्रकार के जोर जुल्म के विरुध्द खड़े होने के लिए, उनको शस्त्रधारी होने का उपदेश देकर, भारतीय लोगों को एक नया जीवन बख्शीश किया। प्रचलित रीति-रिवाजों और त्योहारों को मनाने के ढंग में क्रांतीकारी बदलाव लेकर आए। जैसे की हम जानते है कि श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी महाराज ने अपने संसारिक जीवन के अंतिम क्षण श्री हजूर साहिब, नांदेड में व्यतीत किए। 4 अक्तुबर सन 1708 ई. को श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को गुरता गद्दी प्रदान करके, तीन दिन बाद सचखंड गमन कर गए। श्री हजूर साहिब में होला महल्ला, पुरातन रिवायतों के अनुसार, पूर्ण जाहो जलाल के साथ मनाया जाता है, जो कि कई कारणों और परंपराओं के कारण और स्थानों से विलक्षण भी है। 

होले महल्ले के त्यौहार के समय तख्त सचखंड श्री हजूर साहिब नांदेड में दोपहर को श्री दशम ग्रंथ साहिब में से युध्दमयी वाणी के पाठ होते हैं। गुरुजी और खालसाई शूर विरों के ऐतिहासिक शस्त्रों के दर्शन भी होते हैं। फिर पुरातन मर्यादा अनुसार शाम चार बजे तख्त साहिब में अरदास के उपरांत महल्ला निकलता है। जिसमें निशानची सिंघ, निशान साहिब को पकडकर होले महल्ले में शिरकत करते हैं। गुरु महाराज के घोडे सोने और चांदी के काठीयों सहित, पूरी सज धज के साथ सम्मिलित होते हैं। एक घोडे पर नगारची सिंघ नगारा बजाते हुए आगे-आगे चलते हैं। 

सिंघ साहिब जत्थेदार संत बाबा कुलवंत सिंघ जी अपने रवाईती बाणे (वेशभूषा) में संगत के साथ रहकर महल्ले की शोभा बढाते हैं। सिखों के अलावा इस होले महल्ले में मराठा, बनजारा तथा और समाज के कई किर्तनी जत्थे अपने रवायतों के अनुसार, भजन मंडलियों के रुप में श्रध्दा सहित शामिल होते हैं। गतका पार्टियां भी अपने जोहर दिखाते हैं, जिसमें आपसी भाईचारा और प्यार के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। पंजाब से विशेष तौर पर निहंग सिंघ जत्थेबंदियां, संत महापुरुष और भिन्न-भिन्न प्रकार के संप्रदायों के प्रमुख साहिबान और संसार भर से संगत शामिल होती है, गुलाल खेला जाता है, फिर शाम को सूरज छिपने के आस पास (संध्या को) 'हल्ला बोल' चौक से अरदास करके 'हल्ला' बोला जाता है, जिससे पता चलता है कि हमारे पूर्वज अपनी मातृभूमि और स्वाभिमान के लिए युध्द क्षेत्र में किस प्रकार जुझते थे, हल्ला करते थे। यह परंपरा केवल और केवल श्री हजूर साहिब में ही देखने को मिलती है। इस महल्ले की समाप्ती देर रात तख्त साहिब में पहुंचने पर होती है। होले महल्ले की समूह सिख जगत और गुरु नानक नाम लेवां संगत को बहुत बहुत बधाईयां होवे। 

डॉ. विजय सतबीर सिंघ IAS (R)

प्रशासक

गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड, नांदेड

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