संत सिपाही श्री गुरु गोविंद सिंह जी

        श्री गुरु गोविंद सिंह जी क्रांतिकारी, आध्यात्मिक एवं लौकिक गुणों के त्रिवेणी समन्वय वाले युगपुरुष हैं | श्री गुरु गोविंद सिंह जी...

       

श्री गुरु गोविंद सिंह जी क्रांतिकारी, आध्यात्मिक एवं लौकिक गुणों के त्रिवेणी समन्वय वाले युगपुरुष हैं | श्री गुरु गोविंद सिंह जी संपूर्ण मानव समाज के उद्धारक और मानवता के परीपोषक हैं | राष्ट्र निर्माता और लोकनायक गुरु गोविंद सिंह जी का संपूर्ण जीवन मानवता का उच्च आदर्श प्रस्तुत करता है| संत सिपाही श्री गुरु गोविंद सिंह जी के जीवन और कार्य को देखने से पूर्व हमें तत्कालीन धार्मिक,राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों को समझना होगा | गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म देश की उन राजनीतिक परिस्थितियों के बीच हुआ जब यहां मुगल साम्राज्य था | अकबर की उदारता तथा उसके द्वारा प्रस्थापित राजनैतिक शांति पूरी तरह नष्ट हो चुकी थी | राजनीतिक दृष्टि से यह घोर अव्यवस्था का समय था | औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता की नीति के चलते जनता पर कई तरह के अन्याय अत्याचार हो रहे थे | हम देखते हैं कि इस राजनीतिक परिस्थिति का प्रभाव समाज एवं धर्म पर भी पड़ा | उस वक्त देश का समाज दो वर्गों में बँटा था | एक वर्ग शासक का था जिनका जीवन विलासी एवं ऐश्वर्य पूर्ण था | दूसरा वर्ग सामान्य जनता का था जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती थी | धर्म के नाम पर अधर्म मचा था | हिंदू और मुसलमान दो वर्गों में बटां यह समाज सच्चे धर्म और सच्चे मजहब से बहुत दूर था | जाती पाती के भेदभाव के कारण समाज में चारों ओर अव्यवस्था और असमानता दिखाई देती थी | धार्मिक दृष्टि से यह काल घोर पतन का काल था | अंधविश्वास, कुरूढ़ियों का अनुसरण और बाह्य आडंबरों का पालन ही धर्म की परिभाषा बन गई थी | ईश्वर और खुदा की प्रेरणामयी भावनाओं के स्थान पर धर्म गुरुओं का स्थुल तथा लौकिक अस्तित्व स्थापित हो गया था | सामाजिक जीवन जाति- उपजाति में बँट गया था | जातिगत भेदभाव के कारण जनता में आपसी द्वेष बढ़ गया था | इन्हीं सारी पृष्ठभूमि में हम संत सिपाही श्री गुरु गोविंद सिंह जी के जीवन और कार्य को समझ सकते हैं | देश की इन्हीं धार्मिक, राजनीतिक एवं सामाजिक विषम परिस्थितियों में युगपुरुष श्री गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म हुआ |

                          विक्रमी संवत 1723 की पौष सुदी सप्तमी, सन 1666 में पटना में गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म हुआ | अपनी सुप्रसिद्ध रचना ‘ विचित्र नाटक’ में संसार में धर्म स्थापना, साधु संतों की रक्षा तथा दुष्टों के नाश हेतु ईश्वरीय आज्ञा से इस जगत में जन्म लेने का उल्लेख गुरु गोविंद सिंह जी ने किया |

अपनी आयु के आरंभ के 6 साल बालक गोविंद राय ने पटना में व्यतीत किए | उसके पश्चात अपने पिता श्री गुरु तेग बहादुर जी की आज्ञा अनुसार वह आनंदपुर साहिब, पंजाब में आ गए |उनके पिता श्री गुरु तेग बहादुर जी ने अपने पुत्र बालक गोविंद राय की शिक्षा दीक्षा पर विशेष ध्यान दिया | आठ वर्ष की आयु तक बालक गोबिन्द राय ने सांसारिक ,आध्यात्मिक साथ ही साथ शस्त्र विद्या भी हासिल कर ली थी | पंजाबी, संस्कृत, फारसी के अध्ययन के साथ ही साथ बालक गोविंद राय ने नेजा बाजी, तीरंदाजी, घुड़सवारी, तैराकी आदि शस्त्र विद्या में भी निपुणता प्राप्त कर ली थी |

                       संत सिपाही गुरु गोविंद सिंह जी के जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव उनके पिता गुरु तेग बहादुर जी की शहादत है |उस समय भारत में मुगलों का साम्राज्य था | मुगल शासक औरंगजेब बड़े पैमाने पर जबरदस्ती तलवार के बल पर धर्म परिवर्तन करवा रहा था |और इसका प्रारंभ उसने कश्मीर से किया था | औरंगजेब ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उसे मालूम था कि ब्राह्मण हिंदू समाज में पूज्य माने जाते हैं | यदि ये पंडित अपना धर्म परिवर्तन कर लेंगे तो बाकी हिंदू समाज स्वयं उनके पीछे चलेगा और धर्म परिवर्तन कर लेगा | औरंगजेब ने कश्मीरी पंडितों को मृत्यु का भय देकर धर्म परिवर्तन करने के लिए मजबूर किया | औरंगजेब के इस धर्म परिवर्तन के आदेश से त्रस्त होकर कश्मीरी पंडितों ने अपने धर्म एवं प्राणों की रक्षा के लिए बहुत जगह जाकर सहायता मांगी | पर कहीं से भी उन्हें सहायता नहीं मिली | तब उन्हें बताया गया कि आप गुरु नानक देव जी की गुरु गद्दी पर सुशोभित नवम गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास चले जाओ |कश्मीरी पंडित का यह समूह आनंदपुर साहेब श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास आया | अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों की दुखमय कथा उन्होंने गुरु तेग बहादुर जी को सुनाइ,जिसे सुन गुरु तेग बहादुर जी विचार मगन हो गए | उसी समय बालक गोविंद राय अपने पिता के पास आए और उन्होंने पिताजी से पूछा कि यह लोग कौन हैं और क्या चाहते हैं ? तब गुरु तेग बहादुर जी ने कहा कि, यह कश्मीरी पंडित है | औरंगजेब इनके ऊपर अत्याचार करके और इनको मृत्यु का भय देकर धर्म परिवर्तन करवाना चाहता है | यह सुनकर बालक गोविंद राय ने पूछा कि पिताजी फिर इसका क्या उपाय है ? तब गुरु तेग बहादुर जी ने कहा कि, इनके धर्म की रक्षा का एक ही उपाय है, अगर कोई महान पुरुष अपने प्राणों का बलिदान दे तो इनके धर्म की रक्षा हो सकती है |और गंभीरता पूर्वक उन्होंने कहा की , धर्म रक्षा का एक ही उपाय है कि कोई सत्पुरुष महात्मा, धर्मात्मा अपना बलिदान दे | तब बालक गोविंद राय बड़ी निडरता और सहजता से बोले कि,’ पिता जी इस समय आप से बड़ा महान पुरुष और कौन हो सकता है ? आपको ही इनकी सहायता करनी चाहिए |’ अपने 9 वर्षीय बालक के साहसिक उत्तर से प्रभावित गुरुजी ने दुखी पंडितों से कहा कि औरंगजेब से जाकर कह दो यदि गुरु तेग बहादुर जी धर्म परिवर्तित कर लेंगे तो हम सभी भी अपना धर्म परिवर्तित कर लेंगे | औरंगजेब तक यह संदेश पहुंचा | उसने गुरु तेग बहादुर जी को बंदी बनाकर दिल्ली लाने का हुक्म दिया | पर गुरु तेग बहादुर जी खुद ही दिल्ली चले गए | भाई मती दास ,भाई सती दास, भाई दयाला, भाई जैता, भाई उदा और भाई गुरदित्ता ये सिख भी गुरु तेग बहादुर जी के साथ दिल्ली गए | धर्म परिवर्तन करने के लिए गुरु तेग बहादुर जी को कई प्रलोभन दिए गए | जब गुरु तेग बहादुर जी नहीं माने तो उनके मन में मौत का खौफ पैदा करने के लिए भाई मती दास जी को लकड़ी के घेरे में बांधकर आरे से दो टुकड़ों में चिरवाया गया | भाई दयाला जी को उबलती हुई देग में डालकर शहीद किया गया | भाई सती दास जी के चारों ओर रुई लपेटकर आग लगा दी गई | पर गुरु तेग बहादुर जी अपने निर्णय से तनिक भी विचलित नहीं हुए | आखिर में 11 नवंबर सन 1675 को गुरु तेग बहादुर जी को दिल्ली के चांदनी चौक में शहीद कर दिया गया |इसी स्थान पर सुशोभित गुरुद्वारा शीशगंज गुरु तेग बहादुर जी के अनुपम बलिदान को याद दिलाता है | गुरुजी के शहीद होते ही चारों ओर हाहाकार मच गया | इसी भाग दौड़ में गुरुजी का सिख भाई जैता फुर्ती से उनका शीश उठा आनंदपुर बालक गोविंद राय के पास पहुंचा | बालक गोविंद राय ने भाई जैता के साहसिक कार्य को सराहा और गले से लगाते हुए कहा- रंगरेटा गुरु का बेटा | एक दूसरा सिक्स लक्खी शाह बंजारा अपनी बैलगाड़ी में गुरुजी का शरीर रख अपनी बस्ती पहुंचा | मुगल सैनिकों को पता ना चले इस कारण गुरुजी के शरीर को अपने घर में रख घर को ही आग लगा दी और उनका अंतिम संस्कार किया | इसी स्थान पर गुरुद्वारा रकाब गंज सुशोभित है |

                         संसार का इतिहास साक्षी है कि महान आंदोलनों और क्रांतियों की नींव महान शहीदों के खून से रखी जाती है | धर्म की रक्षा हेतु दी गई कुर्बानी के कारण गुरु तेग बहादुर जी को ‘हिंद की चादर’ कहां गया | पर कवि सेनापति के अनुसार गुरु तेग बहादुर जी केवल हिंद कि नहीं बल्कि संपूर्ण सृष्टि की चादर है | फिर अंग्रेजी विद्वान मैकालीफ़ का कहना है कि, इस शहादत की तुलना दुनिया की किसी भी घटना के साथ नहीं की जा सकती, क्योंकि यह अपने आप में अनोखी और अलौकिक ( unique) घटना है |

                         अपने पिता के बलिदान के समय बालक गोविंद राय की उम्र केवल 9 वर्ष की थी | इतनी छोटी सी उम्र में ही सिखों के दसवें गुरु के रूप में गुरु पद का दायित्व उनके कंधों पर आ गया, सर्वस्वदानी गुरु गोविंद सिंह जी ने इस दायित्व को बड़ी वीरता से निभाया | 

                          

                         गुरु गोविंद सिंह जी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य खालसा पंथ के सृजना या निर्माण का है | गुरु तेग बहादुर जी की शहादत के बाद गुरु गोविंद सिंह जी भली-भांति जान गए थे किऔरंगजेब के जुल्म और अत्याचारों को रोकने के लिए मुगल शासन से सशस्त्र संघर्ष अपरिहार्य है | आध्यात्मिक बल के साथ साथ शस्त्र बल के महत्व को वे एक नवीन समाज के निर्माण में अत्यावश्यक मानते थे | और इसीलिए गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने इस नए खालसा पंथ के निर्माण के लिए बैसाखी वाला दिन चुना | बैसाखी जागृति का प्रतीक माना जाता है |सन 1699 में बैसाखी के दिन केसगढ़,आनंदपुर साहेब में एक विशाल सम्मेलन का आयोजन किया गया | इसमें संपूर्ण भारत तथा अफगानिस्तान ईरान तक फैले गुरुजी के सिखों को बुलाया गया था | विशाल समुदाय के सम्मुख हाथ में चमकती तलवार लिए गुरु जी ने क्रम से 5 सिखों का शीश मांगा | लाहौर निवासी दयाराम खत्री ,हस्तिनापुर के रहिवासी धर्मदास जाट ,जगन्नाथ पुरी के रसोइए हिम्मत राय, द्वारका के धोबी मोहकम चंद और बीदर के नाई साहेब चंद ने अपना अपना शीश भेंट किया | गुरुजी ने पांचों प्यारों अमृत पान कराया और उन्हें दया सिंह जी, धर्म सिंह जी, हिम्मत सिंह जी ,मोहकम सिंह जी और साहेब सिंह जी ये नाम दिए | गुरुजी ने उन्हें पंज प्यारे की पदवी प्रदान की | फिर से गुरु जी ने उन पांचों प्यारों से खुद भी अमृत पान किया और वे गोविंद राय से गोविंद सिंह बन गए | संसार के धार्मिक इतिहास में यह एक ऐसा इंकलाबी कदम माना जाता है, जिसमें किसी गुरु ने अपने ही शिष्यों से दीक्षा प्राप्त की | इस प्रकार गुरु गोविंद सिंह जी ने अमृत पान करा कर समाज में प्रचलित जाती पाती तथा ऊंच नीच के भेद को नष्ट कर सब की समानता की घोषणा की | श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने पूर्व की 9 पीढ़ियों के सिख समुदाय को संत सिपाही खालसा की पदवी प्रदान की | पांच ककार- केश , कंघा, कड़ा, कछहरा और कृपाण से सुसज्जित खालसा की एक विशिष्ट पहचान बनाई | 

                          इतिहास साक्षी है उस समय का भी जब मानव कल्याण हेतु और देश की जनता को अत्याचारों से मुक्त कराने हेतु सर्वस्व दानी गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने चारों पुत्रों का भी बलिदान दे दिया | खालसा निर्माण की चारों ओर से तीव्र प्रतिक्रियाएं आई थी | गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा सजाए नए पंथ तथा उनकी बढ़ती सेना और बढ़ती शक्ति से मुगल साम्राज्य और पहाड़ी राजे चिंतित हो उठे थे |मुगल सेना ने पहाड़ी राजाओं के साथ मिलकर आनंदपुर पर कई आक्रमण किए पर हर बार उन्हें हार माननी पड़ी | अपनी प्रतिष्ठा के नष्ट होने की आशंका से मुगल साम्राज्य ने एक विशाल सेना आक्रमण के लिए आनंदपुर भेजी | इस विशाल सेना ने आनंदपुर के चारों ओर कड़ा घेरा डाल दिया | लगभग 8 महीने ऐसे ही शत्रु का घेरा रहा | अंत में गुरु गोविंद सिंह जी ने अपनी बची सेना और परिवार सहित दुर्ग छोड़ दिया |वर्षा और शीत की रात्रि में सरसा नदी के तट पर गुरु गोविंद सिंह जी का पूरा परिवार बिछड़ गया | गुरुजी अपने 40 सैनिकों और दो बड़े पुत्रों अजीत सिंह और जुझार सिंह सहित चमकौर के कच्चे किले में पहुंचे | उनके दो छोटे पुत्र जोरावर सिंह और फतेह सिंह अपनी दादी, माता गुजरी जी के साथ अपने एक रसोइए गंगाराम के साथ उसके गांव की ओर चले गए | 

                          22 दिसंबर ,1704 को चमकौर के कच्चे किले में संसार का अनोखा युद्ध शुरू हुआ | एक और चमकौर की गड़ी में 40 सिख थे तो दूसरी ओर बाहर लाखों में मुगल सेना थी | गुरु गोविंद सिंह जी के दोनों बड़े साहेबजादे 19 वर्षीयअजीत सिंह और 17 वर्षीय जुझार सिंह भी युद्ध मैदान में उतरे | बड़ी वीरता पूर्वक मुगल सेना से लड़ते-लड़ते 40 सिखों के साथ गुरु गोविंद सिंह जी के दोनों बड़े साहिब जादे भी शहीद हो गए | गुरुजी के दोनों छोटे साहबजादे 9 वर्ष के जोरावर सिंह और 7 वर्ष के फतेह सिंह तथा माता गुजरी जी को गंगाराम ने धन के लोभ में सरहिंद के सूबेदार वजीर खां को सौंप दिया | वजीर खान ने दोनों छोटे साहबजादे को धर्म परिवर्तन के लिए प्रलोभन देकर मजबूर किया | इस्लाम न स्वीकार करने के कारण दोनों छोटे साहबजादों को जिंदा दीवार में चिनवा दिया गया | दोनों छोटे साहिब जादों ने हंसते हंसते कुर्बानी को गले लगाया पर अपना धर्म नहीं छोड़ा || माता गुजरी जी ने भी इस शोक में अपने प्राण त्याग दिए | 

                           अपने चारों पुत्रों की शहीदी पर खाल से के पिता, दशमेश पिता श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने सिखों की ओर संकेत करते हुए-

            “ इन पुत्रन के शीश पर ,वार दिए सुत चार , 

              चार मुए तो क्या हुआ, जीवित कई हजार |

                           श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने जीवन में जितने भी युद्ध किए, वे धर्म युद्ध थे | यह धर्मयुद्ध उन्होंने दौलत हासिल करने, अपनी जीत के अहंकार को बढ़ाने, या किसी राज्य को जीतने के लिए नहीं किए थे | अपितु जुल्म तथा अत्याचार पीड़ित गुलाम भारतीय जनता को मुक्त कराने के लिए किए थे | मातृभूमि की रक्षा, धर्म की रक्षा तथा मानवता हेतु उन्होंने अपने माता-पिता, चारों पुत्रों और अनगिनत सिखों को कुर्बान किया | सर्वस्वदानी श्री गुरु गोविंद सिंह जी के लासानी जीवन की मिसाल संपूर्ण संसार में दूसरी नहीं है |

                              श्री गुरु गोविंद सिंह जी जहां संत सिपाही थे, वही वह अद्भुत भाषाविद एवं महान कवि भी थे |उन्होंने ‘ दशम ग्रंथ’ की रचना की | गुरमुखी लिपि में लिखित इस ग्रंथ में गुरु गोविंद सिंह जी की सभी रचनाएं संग्रहित हैं | इन के दरबार में 52 कवियों का होना भी प्रसिद्ध है | दमदमा साहिब, पंजाब में श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने ‘ श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी ‘ को पुनः संपादित करने का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया |

                               सन 1708 को गुरु गोविंद सिंह जी दक्षिण के गोदावरी नदी के तट पर स्थित स्थान नांदेड पहुंचे | जब उन्हें ज्ञात हुआ कि सचखंड गमन का समय करीब पहुंचा है तब उन्होंने ‘ श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ को गुरु गद्दी प्रदान की और पूरे सिख जगत को यह आदेश दिया कि आज के बाद व्यक्ति गुरु की परंपरा यहां समाप्त हो गई और आज से सिर्फ शब्द गुरु ‘ श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी ‘ को ही प्रत्येक सिख अपना गुरु मानेगा | विक्रमी संवत 1765 की कार्तिक सुदी पंचमी, 7 अक्टूबर 1708 को श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ज्योति ज्योत समा गए | तब इनकी आयु 42 वर्ष की थी |

     

 डॉ परविंदर कौर महाजन 

                                   हिन्दी विभागाध्यक्ष 

            नेताजी सुभाषचंद्र बोस महाविद्यालय नांदेड 

           

           


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