वीर बाल दिवस

आज सारा विश्व 26 दिसंबर को 'वीर बाल दिवस' के रूप में मनाने के लिए उदयुक्त है।'वीर बाल दिवस' पर श्री गुरु गोविंद सिंह जी क...

आज सारा विश्व 26 दिसंबर को 'वीर बाल दिवस' के रूप में मनाने के लिए उदयुक्त है।'वीर बाल दिवस' पर श्री गुरु गोविंद सिंह जी के चारों साहिबजादों साहिब बाबा अजीत सिंह जी ,बाबा जुझार सिंह जी, बाबा ज़ोरावर सिंह जी तथा बाबा फतेह सिंह जी के बलिदान को याद किया जाएगा। दो छोटे साहिबजादो के बलिदान को समर्पित यह "वीर बाल दिवस" अत्यंत विशेष है।

                        इस संसार में कई महान विभूतियों द्वारा बलिदान दिया गया है। भारत भूमि सदा से ही शूर वीरों के प्राणों को सींचने वाली पवित्र भूमि रही है । इस भूमि ने कई योद्धा ,महात्मा,राजा, पुण्यात्मा,संत, गुरुओं को जन्म दिया है। कईयों ने बलिदान, शहादत प्राप्त की है ।परंतु इनमें से कई अनगिनत वीर ,वीरांगनाओं की वीरता को सदियों तक गुमनामी के अंधेरे में रखा गया। उनके जीवन के बारे में जानकारी हमें आज भी पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं हो पाई है। मनुष्य को अपना इतिहास सदा स्मरण रखना चाहिए ।इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में श्री गुरु गोविंद सिंह जी के चार साहिबजादों की वीर गाथा लिखी गई है। उस वीरगाथा को श्रद्धा तथा सम्मान से जनसामान्य तक पहुंचाने की समय की मांग है।

                                              सम्पूर्ण विश्व में कई धर्म है सबकी अपनी विशिष्ट पहचान तथा महत्व है। इनमें सिक्ख धर्म भी एक है ।सिख धर्म के संस्थापक श्री गुरु नानक देव जी ने जिस मानवता धर्म की स्थापना की उसे उनके परवर्ती गुरुओं ने पूर्ण रूप से स्वीकारा। सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह जी ने भी अपना सर्वस्व न्याय तथा धर्म की स्थापना हेतु समर्पित किया। ऐसे सरबंसदानी, खालसा पंथ के संस्थापक , शूरता तथा वीरता के पुंज, हिंदू धर्म की रक्षा के लिए बलिदान देने वाले श्री गुरु तेग बहादुर जी के पुत्र श्री गुरु गोविंद सिंह जी के चारों पुत्रों ने भी अपने गुरुओं,दादा तथा अपने पिता के नाम की लाज रख शहीदों की श्रंखला में अपना नाम सदा के लिए जोड़ दिया है।

                                             श्री गुरु गोविंद सिंह जी का परिवार सन 1705 में दिसंबर के महीने में बिछड़ गया जो फिर कभी न मिल सका। श्री गुरु गोविंद सिंह जी के परिवार की शहादत को इतिहास की सबसे बड़ी शहादत माना जाता है,जहां श्री गुरु गोविंद सिंह जी के पिता श्री गुरु तेग बहादुर जी ने औरंगजेब के जबरदस्ती, बलपूर्वक धर्म परिवर्तन का विरोध करने हेतु कश्मीरी पंडितों की मदद की । धर्म की रक्षा हेतु हिंद की चादर बन बलिदान दिया। वहीं उनके पूरे परिवार ने भी जुल्म एवं अत्याचार ,अन्याय का विरोध करते हुए धर्म एवं न्याय की रक्षा हेतु शहीदी प्राप्त की ।उनकी इस अदीवी शहादत को याद करते हुए प्रतिवर्ष 20 से 27 दिसंबर तक शहीदी सप्ताह मनाया जाता है तथा उन शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाते हैं।

                                                             20 दिसंबर सन 1705 में मुगलों ने आनंदपुर साहिब पर हमला बोल दिया । श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने परिवार एवं अन्य सिखों के साथ आनंदपुर किला छोड़ा और वहां से निकले। 21दिसंबर के दिन जब सब लोग सरसा नदी पार कर रहे थे, तब पानी का बहाव इतना तेज़ हो गया कि गुरु जी का पूरा परिवार उसमें बिछड़ गया जोदोबारा कभी नहीं मिला। बिछड़ने के बाद श्री गुरु गोविंद सिंह जी अपने दोनों बड़े साहेबजादे बाबा अजीत सिंह जी उम्र 18 साल तथा बाबा जुझार सिंह जी उम्र 14 साल तथा अन्य सिखों के साथ चमकौर गढ़ी पहुंचे ।जहां 22 और 23 दिसंबर 1705को दस लाख की मुगल सेना से युद्ध किया।इस युद्ध में श्री गुरु गोविंद सिंह जी के दो बड़े साहिबजादे तथा अन्य सिखों ने वीरता के साथ युद्ध करते हुए शहीदी प्राप्त की। बाद में गुरुजी अन्य सिखों के कहने से वहां से निकल गए। इधर सरसा नदी में बिछड़े हुए दो साहिबज़ादे साहिब बाबा जोरावर सिंह जी उम्र 7 साल , साहिब बाबा फतेह सिंह जी उम्र 5 साल,अपनी दादी मां माता गुजरी जी के साथ निकल गए । जहां गुरुजी के सेवक गंगू ने उन्हें अपने घर रखा। माताजी के पास रखे सोने की मुहरों के लालच में आकर उसने सरहिंद के नवाब वजीर खां को माताजी तथा बच्चों की जानकारी दी। जिसके बाद माता गुजरी जी और दो छोटे साहिबजादो को कैद कर लिया गया ।25 और 26 दिसंबर को वजीर खान ने उन्हें ठंडे बुर्ज में कैद किया। बच्चों को बहला-फुसलाकर, डरा धमकाकर धर्म परिवर्तन करने के लिए कहा गया पर दोनों नन्हे वीरों ने अपनी निडरता एवं साहस का परिचय देते हुए धर्म परिवर्तन करने से मना कर दिया।तब 27 दिसंबर को दोनों को दीवार में चुनवा देने का हुक्म हुआ। हंसते-हंसते दोनों शहीद हो गए पर उफ़ तक नही की । यह ख़बर जैसे ही

माता गुजरी जी के पास पहुंची उन्होंने भी अपने प्राण त्याग दिए। गुरुजी को जब यह ख़बर मिली तब उन्होंने औरंगजेब को एक खत, "जफरनामा" लिखा ,जिसमें उन्होंने उसके द्वारा किए गए अमानवीय कुक्रत्यों को मुगल साम्राज्य के विनाश का कारण बताया।

                             धर्म की रक्षा हेतु, मानव अधिकारों की रक्षा हेतु, मानवीय उच्च मूल्यों की रक्षा हेतु किया गया यह बलिदान विश्व का सर्वोच्च बलिदान है। मात्र 5 और 7 वर्ष की आयु में जहां बच्चों को मासूम, चंचल बालक के रूप में जाना जाता है,जब वे कोई निर्णय लेने की अवस्था में नहीं होते, ऐसे में इन बलवीरों ने अपना धर्म परिवर्तन करने से मना किया । यह साधारण बात नहीं थी। बाल्यवस्था में विचारों की प्रगल्भता,संयम, सूझबूझ, निर्णय में अडिगता असाधारण है ।इतनी छोटी उम्र में भी उनके मन में किसी प्रकार का डर, लालच, भय, विचारों में असामंजस्य अथवा भ्रम तिल मात्र भी नहीं था। था तो केवल साहस। अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस। इसी साहस एवं अपने सुसंस्कारों का परिचय देते हुए वजीर खान के सामने उन्होंने अपना शीश तक नहीं झुकाया, उल्टे उसे उसके द्वारा किए जाने वाले दुष्कर्म का सबक सिखाया। वे स्वेच्छा से हंसते-हंसते जिंदा दीवार में चुन गए ।ऐसा कर इन नन्हे से महान योद्धाओं ने , ब्रह्मज्ञानी साहिबजादों ने विचारों की स्वतंत्रता, जीवन जीने के अधिकार को सर्वोच्च माना। धर्म के महान सिद्धांतों की रक्षा हेतु मृत्यु को हंसते-हंसते गले लगाया, पर अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाया। ऐसा कर उन्होंने पूरे विश्व में सत्य तथा न्याय धर्म की स्थापना की।

                           आज आवश्यकता है, आज समय की मांग है कि ऐसे वीर बलिदानी साहिबजादों की शहादत के इतिहास के बारे में सभी को पता चले ।केवल भारत ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व को प्रेम, शांति सदाचार, सत्य ,विश्वास, न्याय का संदेश इन वीरों ने दिया है। कभी किसी के सामने विवश ना होना, हार न मानना ,किसी के आगे नहीं झुकना मानव धर्म की पहचान है और इसी पहचान को कायम रखने के लिए इन वीर साहिबजादों ने बलिदान देकर सदा के लिए अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। अपने देश की संस्कृति एवं धर्म की रक्षा के लिए स्वयं का बलिदान कर उन्होंने अपने दादाजी के कहे वचनों को अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से साकार कर दिखाया। श्री गुरु तेग बहादुर जी के वचन हैं" भय काहू को देत नहि नहि भय मानत आन।। कहू नानक सुन रे मना गियानी तहे बखान।।" अर्थात, हमें न किसी को डराना चाहिए ना किसी से डरना चाहिए, इस बात को जो समझ लेता है, वही ज्ञानी कहलाता है । जिस अवस्था में बच्चे खिलौनों से खेलते हैं उस अवस्था में साहिबजादे ज्ञान के चरम अवस्था में पहुंच गए थे। मन को किसी प्रकार के लालच, माया, मोह से ना बांधकर सत्य , साहस, धर्म एवं न्याय की स्थापना कर चले ।उन्होंने सच और झूठ में सच को चुना। धर्म और अधर्म में धर्म को स्वीकारा। जीवन तथा मृत्यु में मृत्यु को गले लगाया। क्योंकि वे जानते थे कि सत्य, धर्म एवं मृत्यु ही शाश्वत है ।

                                                 आज हमने कई क्षेत्र में आधुनिकीकरण किया है। विकास के अनगिनत साधन आज हमारे पास उपलब्ध हैं। फिर भी मनुष्य दुखी है ।माया ,मोह, लालच ,स्वार्थ में स्वयं की पहचान वह खोता जा रहा है । नन्हे साहिबजादों ने सब से ऊपर उठकर अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई । कड़कड़ाती, हड्डियों को चीरती सर्द हवाओं में, नंगे पैरों से, नन्हे हाथों में बेड़ियां पहने, लहू से सने नन्हे जिस्म भी उन शूर वीरों के इरादों को तोड़ नहीं पाए। आज हमें भी सत्य धर्म एवं न्याय का साथ देने की परम आवश्यकता है। हमें बाल्यावस्था से ही बच्चों को ऐसी शिक्षा एवम संस्कार देने चाहिए जिससे इन्हे मानसिक विचारों से दृढ़ बनाया जा सके,ताकि आने वाले भविष्य में वे डगमगाए नहीं। निर्णय लेने की क्षमता उनमें होनी चाहिए। स्वयं को तथा औरों को साथ लेकर चलने में भी सक्षम रहे। जो मानवीय मूल्यों की रक्षा के खातिर अपने जीवन को समर्पित कर देते हैं सारी दुनिया नतमस्तक हो उन्हे नमन करती है। गुरबाणी भी कहती है "ओना दे मुख सद उजले ओना नो सभ जगत करे नमस्कार।।"। "बालवीर दिवस "के इस शुभ अवसर पर शुरवीर साहिबजादों को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम।

डॉ. राजेंद्र कौर महाजन,

 हैदराबाद


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