अभिनव भारत शिक्षण संस्था संचलित, नेताजी सुभाषचंद्र बोस महाविद्यालय में हिंदी विभाग की ओर से ‘लेखक से संवाद’ ( ‘नदीष्ट’ उपन्यास पर चर्चा ) का...
अभिनव भारत शिक्षण संस्था संचलित, नेताजी सुभाषचंद्र बोस महाविद्यालय में हिंदी विभाग की ओर से ‘लेखक से संवाद’ ( ‘नदीष्ट’ उपन्यास पर चर्चा ) कार्यक्रम का आयोजन किया गया था l इस कार्यक्रम के अध्यक्ष महाविद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ. महेंद्रकुमार कुलकर्णी थे l लेखक तथा मार्गदर्शक के रूप में के. आर. एम. महिला महाविद्यालय, नांदेड़ के सुप्रसिद्ध लेखक प्रा. मनोज बोरगांवकर उपस्थित थे l उन्होंने 'नदीष्ट’ उपन्यास पर चर्चा करते हुए कहा कि प्रकृति को पढ़ना अपने आप में एक अद्भुत अनुभव है l उससे मिलने वाला आनंद अनोखा होता है l इसके लिए लेखक को अपनी ईमानदारी बनाए रखना चाहिए और प्रकृति के साथ संबंध जोड़ना चाहिए l इसी प्रक्रिया से मै नदी के साथ जुड गया l नदी मां का रूप है, मां जिस प्रकार अपने बच्चों का पालन-पोषण करती है, उसी प्रकार नदी भी अपने आसपास के जीवन को आधार प्रदान करती है। इसलिए नदी का प्रवाह जारी रहना चाहिए l मैने जो कुछ भी किया वह अंतर्मन से किया l नदी और वहां की प्रकृति ने मुझे लिखने की प्रेरणा दी l ‘नदीष्ट’ उपन्यास में नदी और मानव जीवन का यथार्थ चित्रण है l सगुना के माध्यम से मैने किन्नर समुदाय के जीवन, उसकी संवेदनाओं और समाज के साथ उसके संबंधों को सामने लाने का प्रयास किया है l साथ ही भिखारीयों का जीवन हमें समाज की असमानताओं और मानवीय संवेदनाओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है l स्त्री, मां, कविता और नदी मुझे एक समान लगती है l इसी कारण नदी मेरे जीवन का अविभाज्य हिस्सा बन गई l इस कार्यक्रम के प्रास्ताविक में हिंदी विभागाध्यक्षा प्रो.डॉ. परविंदरकौर महाजन ने कहां कि ‘लेखक से संवाद’ ( ‘नदीष्ट’ उपन्यास पर चर्चा ) इस कार्यक्रम के अंतर्गत चर्चित उपन्यास ‘नदीष्ट’ के लेखक प्रा. मनोज बोरगांवकर जी से संवाद करने के लिए हम सब यहाँ एकत्रित हुए है l यह हमारे लिए हर्ष और गौरव का विषय है l बी. ए. तृतीय वर्ष के ‘हिंदी अनूदित साहित्य’ पेपर के पाठ्यक्रम में ‘नदीष्ट’ उपन्यास शामिल है l इसलिए इस कार्यक्रम का शैक्षिक महत्व और भी बढ़ जाता है l छात्रों को सामान्यत: पाठ्यपुस्तक के माध्यम से किसी रचना की कथावस्तु, पात्रों और विचारों का अध्ययन करने का अवसर मिलता है, लेकिन जब स्वयं लेखक हमारे सामने उपस्थित होते हैं, तब उस रचना के पीछे की प्रेरणा, अनुभव और विचार-प्रक्रिया को समझने का एक विशेष अवसर प्राप्त होता है l अध्यक्षीय समापन में प्रधानाचार्य डॉ. महेंद्रकुमार कुलकर्णी ने कहां कि प्रा. मनोज बोरगांवकर का ‘नदीष्ट’ उपन्यास नदी के माध्यम से मानव जीवन और समाज के अनेक पक्षों को उजागर करता है l इसमें पर्यावरण प्रदूषण, गरीबी, किन्नर की समस्याएं, मानवीय संवेदनाओं का पतन, सामाजिक असमानता, मनुष्य का दुख जैसी समस्याएं प्रमुखता से सामने आती है l इस समारोह का संचालन हिंदी विभाग के प्रा. देविदास येळणे ने किया तो आभार प्रदर्शन प्रा. सावित्री तेलंगे ने किया l इस समारोह में प्रो.डॉ. बिभीषण करे, प्रो.डॉ. चंद्रशेखर एंगडे, प्रो. डॉ. संजय कुलकर्णी, प्रा. खंडू कांबळे, प्रा. डॉ. संतोष कोटूरवार, प्रा.डॉ. संदीप काळे, प्रा. डॉ. मंगेश अटकोरे, प्रा. सय्यद जमीर, प्रा. स्नेहा आहेर, प्रा. संजोकता राठोड, बी. ए. तृतीय वर्ष के छात्र एवं महाविद्यालय के अध्यापक गण और छात्र एवं छात्राएं बड़ी संख्या में उपस्थित थे l

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