स्त्री विमर्श उभरता हुआ नया आयाम पुस्तक स्त्री विमर्श अवधारणा और स्वरुप− डॉ. ठाकुर विजय सिंह



  गुरुवर्य डॉ.रामा नवलेजी की, नई पुस्तक का प्रकाशन पर ढेर सारी बधाई यह पुस्तक स्त्री अस्मिता और अस्तित्त्व को लेकर भविष्य में नई चेतना देने वाली है | साहित्य में स्त्री विमर्श को लेकर नये रास्ते ढुंढने वाले को नया मार्ग बताने वाली है | एक सर्वमान्य सत्य है कि नारी सदैव और सर्वत्र परिवार का मुख्य आधार रही है | साहित्यकार की भावना में प्रारम्भ से ही नारी दो परस्पर विरोधी रुपों में विद्यमान रही है |

  एक ओर चिन्तन धारा के अनुसार नारीके गरिमामय उदात्त रुप का प्रस्तुतीकरण हुआ है और दूसरी ओर नारीके अवगुणों का पूरा लेखा−जोखा प्रस्तुत करके उसे निन्दित किया गया है | इस सत्य को भी नकारा नहीं जा सकता | आज का साहित्य यदि उक्त तथ्यों को अपने ध्यान में रखकर नारी चरित्रांकन की ओर प्रवृत्त तो स्वस्थ परम्पराओं का निश्चित रुप वे विकास होगा |

  गुरुवर्य डॉ.रमा नवले जी की नई पुस्तक प्रकाशित हुई है जो स्त्री विमर्श अवधारणा और स्वरुप साहित्य अकादमी पुरस्कृत समीक्षा की समीक्षा जो बडी गहनसोच और समझ के दृष्टी से सराहनिय है | १८.०१.२०२५ शनीवार पीपल्स कॉलेज के नरहर कुरुंदकर सभागृह में प्रकाशित होने जा रही है |

  विश्व सभ्यता का इतिहास साक्षी है कि विश्व में पुरुष की अपेक्षा नारी को जानने, पहचानने एवम विश्लेषित करनेकाकार्य अधिकहु आहै | सम्भवत: उसका एककारण यहहै कि विश्व की लगभग सभी सभ्यताओं का विकास मातृ−सत्तात्मक प्रणाली है जिसमें पुरुष के लिए नारी रहस्यमयी रहती है | साथ ही नारी भी अपने को पुरुष से अलग करके नहीं देख पाती उसके व्यक्तित्व के विकास एवं निर्धारण में पुरुष का महत्वपूर्ण योगदान रहता है | पितृसत्तात्मक प्रणाली में नारीकीर् आिथक पराधीनता भी उसे स्वाधीन नहींहोने दती | यहकन्या रुप में पिता, पत्नी रुप में पति ओर मॉ रुप में पुत्र पर निर्भर रहती है | यह नारी जीवन परम्परागत बाहय प्रकृति है |

  नारी के विविध रुपों के लिए सम्बन्ध अर्थ विचार और पर्यावरण को आधार बनाया गया है स्त्री विमर्श अवधारणा और स्वरुप व्यक्ति के व्यक्त्वि को समझने के लिए इन आधारों को समझना आवश्यक होता है स्त्री विमर्श अवधारणा और स्वरुप क्योंकि ये आधार व्यक्ति और समाज दोनों पर आधारित हैं स्त्री विमर्श अवधारणा और स्वरुप साहित्य में भी इन आधारों पर आधारित रुपों को अभिवयक्ति मिली है | 

  जैविक रुप में नारी एक मादा है | व्यक्तित्व अथवा प्रकृति और स्वभाव के आधार पर विशेषताओं के कारण हम उसे नारी कहते हैं | नारी एक तीसरी स्थिति है, जो मानवी अथवा मानुषी है | उसके मानवी रुप के भीतर ही उसके अन्य दोनों रुप आते हैं |  उसका मानवी रुप ही महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए | आशारानी व्होरा के अनुसार.. नारी, नारी होकर भी मातृत्व और पत्नीत्व की भूमिका निभाते हुए सर्वप्रथम मनुष्य है, मानवी है | मानवता के अधिकार और दायित्व को लेकर चलनेसेही वह अपनी हीनता जन्य कुंठाओंसे बच सकेगी और पीढ़ी को बेहतर मानवीय संस्कारों से समृध्द कर सकेगी | इससे यह स्पष्ट है कि नारी का मानवी रुप ही अधिक प्रबल और मान्य है | इसी लिए नारी की मानवी रुप में प्रतिष्ठा होनी चाहिए |

  स्त्री−पुरुष सम्बन्धों में भी नारी के तीनों रुप होते हैं | प्रथम स्तर पर नर−मादा सम्बन्ध हैं तो दूसरी स्थिति पुरुष−स्त्रीं सम्बन्धों की है और तीसरी स्थिति मनुष्य और मनुष्य के बीच के सम्बन्धों की है | नर मादा सम्बन्धों का आधार शारीरिक है | स्त्री−पुरुष सम्बन्धोंका आधार मानसिकता है तो मानव के बीच के सम्बन्धों का आधार मानवता है | इन सबमें मानवीय भूमिका ही मुख्य होती है | वर्तमान समाज व्यवसथा में नारीको मानवी कम मादा रुप में अधिक देखा गया है इस कारण स्त्री एक देह बनकर रह गई है | 

  उसे एक देह नहीं बल्कि एक मनुष्य माना जाना चाहिए | सारा पुरुष समाज स्त्रीको देह (भोगवस्तु) मानकर चलता है | अगरस्त्री देह होने से इन्कार करते है तो समाज में कोहराम मच जाता है | उस पर अनेक आरोप लगाए जाते हैं | उसे विवश किया जाता है | कात्यायनी ने लखा है | देह नहीं होती है, एक दिनस्त्री और उलट−सुलट जाती है सारी दुनिया अचानक |

  भारतीय नारी का उभरता हुआ नया रुप निराशाजनक नहीं है | धीरे−धीरे उसमें वैचारिक स्पष्टता आ रहीहै | शिक्षा, बौध्दिकता और स्वस्थ मानवतावादी दृष्टिकोण लिए हुए वह पति के कन्धे से कन्धा मिलाकर परिवार और विवाह संस्था को अधिक सुदृढ़ एवं सुरक्षित रख सकेगी | आज की नारी पुरुष से न तो बहुत आगे निकल जाना चाहती है और न ही बहुत पीछे रहकर घिसटना पसंद करती है |

  कुल मिलाकर गुरुवर्य डॉ.रमा नवले जी की पुस्तक स्त्री विमर्श अवधारणा और स्वरुप भविष्य में  नया रास्ता बताने में सफल रहेगी | पाठको के लिए एक नये चिंतन के दृष्टिकोन को आगे बनाते जायेगी | इन पुस्तक प्रकाशन के लिए शुभकामनाए |

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