गुरु रमा जी को जितना मैंने जाना…. डॉ गोविंद शिवशेट्टे


मराठवाडा अपने आप में आज भी पिछड़ा क्षेत्र माना जाता है। १९४७ में देश आजाद हो गया । तब मराठवाडा निजामी सल्तनत का हिस्सा था । १७ सितंबर १९४९ को आर्यसमाज और भारत सरकार  के अवदान से मराठवाडा महाराष्ट्र का हिस्सा बना। और निजामी सल्तनत की जंजीरों से हमेशा के लिए  मुक्त हो गया। उदगीर तीन राज्यों की सीमाओं के आंचल  में बसा हुआ एक ऐसा पुराना गांव जहां अनेक ऐतिहासिक विरासत आज भी अपना वजूद जमाए हैं। इसी उदगीर गांव के एक आर्य समाजी परिवार में 12,जनवरी 9159 को नरक चतुर्दशी तथा लक्ष्मी पुजन के शुभ दिनी पर रमा बुलबुले का जन्म हुआ। 

बीसवी शती का आठवाँ दशक,यह वह दौर था जहां भारत भर में लड़कियों को शिक्षा के नाम पर  दाखिला देने के बारे में आना-कानी की जाती थी। उदगीर जैसे छोटे से गाँव में भी  लड़कियों को  पढ़ाने के खिलाफ माहौल रहा ।   पिताजी  आर्यसमाज के विचारों और संस्कारों से प्रभावित होकर मराठवाडा मुक्ति संग्राम में स्वातंत्र्य सेनानी के रूप में योगदान दिया । आर्यसमाज के विचारों ने घर में लड़कियों को शिक्षा के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया।  पिताजी संबल से और माताजी के संस्कारों से  फिर शुरू हुआ रमा का शैक्षिक सफर । समाज के तानों से अनेक यातनाएं भी झेलनी पड़ी किंतु सबसे दो हाथ कर आगे बढ़ गये। कहते हैं,एक सफल स्त्री के पिछे एक सफल पुरूष का हाथ होता है इसके अनुसार रमा जी के सफलता में पिता जी का हाथ और साथ  रहा जिसका नतीजा आज रमा जी ने जीवन में उच्च शिक्षा के अनेक पड़ाव पार किये जिसपर सबको नाज़ है।

सन १९७८ -७९ में महाराष्ट्र उदयगिरी महाविद्यालय में एम.ए के लिए दाखिला लिया। उस दौर में यह महाविद्यालय अपने आप में शैक्षिक उच्चतम स्तर पर विद्यमान था। यह महाविद्यालय उस समय मराठवाडा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद से संलग्न था। हिंदी विभाग में प्रा नरसिंहप्रसाद दुबे प्रा नरेंद्रकुमार मेहरा जैसे नामी अध्यापक कार्यरत थे।  रमा जी को दो भिन्न विचारों के अध्यापक मिले जिनसे काफी प्रभावित रहे। प्रा. मेहरा जीने आदर्शवादी विचारों को रोपने का काम किया। जिसके कारण आगे बढ़ने की हमेशा प्रेरणा मिलती रही। रमा जी ने अनेक व्याख्यानों में इस बात को स्वीकार किया है कि काश मेहरा जैसे सर उनको न मिलते तो आगे बढ़ने कि इतनी जिज्ञासा उत्पन्न नहीं होती। लेखिका को इस मुकाम तक पहुंचने में मेहरा जी के आदर्शवादी विचार महत्वपूर्ण रहे हैं। लेखिका रमा जी के शब्दों में “मेहरा जी  जैसे आदर्शवादी शिक्षक मिले. मेहरा सर  की प्रेरणा ने जीवन को नया मोड़ दिया, प्रेरणादायी शब्दों के सामर्थ्य का पता चला।”

प्रा.नरसिंह प्रसाद दुबे एक वास्तववादी विचारों के अध्यापक रहे हैं। इन्हीं विचारों का अलख विद्यार्थियों में जगाने कार्य उन्होंने ताउम्र किया है। रमा एम. ए कक्षा की एक होनहार छात्र थी। रमा के पढ़ने की ललक और जिज्ञासा देखकर दुबे जी ने आगे बढ़ने के लिए एक अध्यापक के नाते जो किया जाना वह किया । विशेषतः वास्तववादी विचारों का बींजाकुरण किया है। मेहरा जी ने सपनों की उड़ान भरने का काम किया तो वहीं दुबे सर ने ज़मीनी हक़ीक़त से जोड़ा अर्थात ही सपनों के पतंगों की उड़ान भरना है तो  ज़मीनी स्तर पर रहकर ही पतंग की डोर पकड़े रहने के विचार दिए हैं इन दो शख्सियतों ने…उनके प्रति नमन…

लगन के साथ पढ़ने का नतीजा रमा जी को मिला १९८० में मराठवाडा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद की स्नाकोत्तर परीक्षा में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त कर सुवर्ण पदक की हकदार हुई। इस दौर में जहां लड़कियों को पढ़ने के लिए जहां प्रतिकूल वातावरण था । ऐसे स्थिति में एम.ए हिंदी में सर्वप्रथम स्थान पाना अपने आप में समाज के लिए सकारात्मक संदेश देनेवाली घटना थी। फिर उसके बाद रमा जी ने कभी  पिछे मुडकर नहीं देखा। दुबे और मेहरा सर ने दिखायें सपनों को जमीनी स्तर पर हासिल किया।

रमा जी जब एम. ए में पढ़ रही थी उस समय दयानंद कला महाविद्यालय,लातुर में कार्यरत डॉ सुर्यनारायण रणसुभे के विचारों से काफी प्रभावित हुई । उदयगिरी महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा अतिथि व्याख्याता के रूप में रणसुभे सर को आमंत्रित किया जाता था  । उनको सुनने का अवसर मिलता रहा.. गुरुओं की कड़ी में एक ओर रणसुभे सर के रुप बनी । उनके  विचारों से प्रभावित होकर लेखन की बुनियाद तैयार हुई। 

विवाह, बच्चे,  महाविद्यालय की जिम्मेदारिया एक साथ अकेले झेलते- झेलते (नौकरी के कारण आजीवन अकेले ही निभाना पड़ा) जिंदगी व्यतीत होने लगी. परिवार मे निर्णय लेने की आज़ादी थी और पति का रमा जी पर विश्वास था.  साथ न मिलने के बावजूद दिन गुजरते रहे .. सांसारिक जीवन की लता पर योगेश और योगिता के रूप में दो फुल खिले और सांसारिक जीवन की सारी खुशियां झोली में आयी ।

 

विश्वविद्यालय के विभिन्न समितियों पर काम करते समय डाॅ. सूर्यनारायण रणसुभे जैसे सुधी व्यक्तित्व से विभिन्न विषयों पर चर्चा होते रहती और उनकी ऊर्जा ने मुझे अध्यापक से समीक्षक तथा स्त्री चिंतक के रुप में स्थापित किया । इसलिए मैं डॉ सुर्यनारायण रणसुभे जी को 'ऊर्जा का पाॅवर स्टेशन'  मानती हूं। ऐसी ऊर्जा पास होने के कारण रमा जी की अकादमिक गाड़ी कभी पटरी पर खड़ी नहीं हो पायी। रणसुभे जी ने पेंशन मुफ्त  में न खाने का पाठ इतना पक्का पढ़ाया कि चुपचाप बैठना चुभने लगता है। 

   पढ़ाना रमा जी के लिए नौकरी नहीं आनंद का विषय रहा। चुंकि अभिव्यक्त होने का और अपने विचारों, भावनाओं को नयी एवं ताजी पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम है अध्यापन  । इस बात का अनुभव मात्र मेरा नहीं बल्कि तमाम छात्रों का भी रहा है। काव्यशास्त्र जैसा विषय जिस तन्मयता और सुलभता से समझाया जाता था कि, मानो छात्र रस सिध्दांत पढ़ते-पढ़ते कब साधारणीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा बनकर सहृदय आस्वादक बन जाते थे। घड़ी के ठोके कब बज जाते थे पता न चलता था। वहीं चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त,आधे-अधूरे,कोमल गांधार  नाटक,गोदान,मैला आंचल उपन्यास, तमाम कहानियां पढ़ाते तो पढ़नेवाले लिंगभेद ,अपने-पराये पण का अंतर भूलकर तल्लीन हो जाते थे। अध्यापन शैली तो गजब की थी…निर्झर बहती अभंग धारा समान । जिसे छात्र कविमित्र  संतोषकुमार यशवंतकर ने इसे काव्य में बांधा है-

जिस समय आप पढाती हो,

उस समय समा बंध जाता है।

हम अपने को भूल जाते है।

भूख प्यास भी मिट जाती है।

 

जिस समय आप पढ़ाती हो,

निराशा का अंधेरा हट जाता।

उम्मीदों का सुर्योदय हो आता।

आगे बढ़ने का हौसला बंधता।

ओर सबसे बड़ी बात…

अपने आपसे परिचय हो जाता

 

जिस समय आप पढाती हो,

जो कहा वे न केवल शब्द है।

जो कहां वह  केवल विचार नहीं,

अनुभूति के विश्व का थाह लेते 

जीवंत शब्द है ,विचार है।

जो हमारा हाथ , आंचल पकड़कर 

किनारे पहुंचाती है।

अपने-आप से परिचय कराती। 

 

बहुत सोच रहा था कुछ लिखुं...पर किन पहलुओं पर लिखुं...आपके अध्ययन और अध्यापन की प्रतिबद्धता,आपकी सादगी और विनम्रता, रसगुल्ले की भांति लबालब भरे रस सम आपकी संवेदनशीलता, किसी से भी कुछ न पाने की निःस्वार्थता...या स्नेह की अखंड प्रवाहित निर्झर धारा।  ...कभी आप कामायनी के श्रध्दा की याद दिलाते हैं...तो कभी स्कंदगुप्त के देवसेना की...देवसेना के चरित्र को लेकर नाट्यालोचक दशरथ ओझा लिखते हैं-"देवसेना का चरित्र प्रसाद के नाटकों का वह उज्जवल रत्न है जिसकी प्रभा कभी मंद नहीं पड़ती ।"  ठिक यही बात  रमा जी के संदर्भ में मुझे सटीक लगती है। मॅडम में प्रभा के ऐसे कई  रुप है जिनमें विनम्रता, मृदुभाषिता, संवेदनाशील , अपनत्व और मर्यादाशीलता। 

   आप हमेशा कहते रहे है कि, मनुष्य चाहे जितना पढ लिख ले पर उसे अजन्म विद्यार्थी ही होना चाहिए...अध्ययन... लेखन उसका इति दायित्व है। इस बात को आपने सेवाकाल मे भी और सेवाकाशकाल के पश्यात भी निभा रहे है। आपका लेखन ऐसे लोकप्रियता प्राप्त करता रहे। हम जैसे पाठकों को चिंतन के लिए बाध्य करता रहे। लेखक जब तक लिखता है तब तक स्वस्थ रहता है।हम भी चाहेंगे आप लिखते रहे मतलब...आप स्वस्थ रहे…

रमा जी के अपने कुछ सिध्दांत है...कुछ उसूल भी...जो कहने मात्र भर के लिए नहीं बल्कि ताउम्र उन सिद्धांतों, उसूलों के पथ पर निरंतर चलते रहे हैं। हां ये बात सच है कि इसके कारण जिनको अनेक प्रकार की कठीण परिस्थितियों से गुजरना पड़ा...मैम से जब भी मेरी बात होती तो कहता मैम आप अपने सिद्धांतों को जरा दूर कीजिए... व्यावहारिक स्तर पर दूनिया क्या चाहती है ऐसे समझौते पर आइये...तो जवाब मिलता गोविंद शिवशेट्टे ...हम अध्यापकों की कुछ जिम्मेदारियां होती है वह यदि हम नहीं निभायेंगे तो फिर कोन निभाएगा...हम ही समझौता करते रहेंगे तो अपने उसूलों का क्या?

इसके आगे बोलने की हमारी कोई हिमाकत नहीं होती थी। अध्यापन,प्रशासन तथा विश्वविद्यालय के विभिन्न पदों की जिम्मेदारियों को निभाते समय और सेवावकाश के बाद भी कोई कोताही नहीं बरती है। ऐसे सिध्दांत,कर्मठ, साहित्य की साधिका, आज भी छात्रों का पथ आलोकित कर संतोष की अनुभूति हम सभी छात्रों के लिए गौरव की बात है।

 साहित्य के क्षेत्र में कुछ नया और अलग देने की जिद ने महाराष्ट्र के हिंदी आलोचकों पर काम करने की प्रेरणा दी रमा जी को मिली . यह अध्ययन करते समय रणसुभे जी की साहित्य समीक्षा में खो गयी और 'समीक्षा की समीक्षा' किताब का जन्म हुआ. इसे साहित्य अकादमी का स्वर्ण पुरस्कार मिला. स्त्रियों की स्थिति को लेकर भीतर एक छटपटाहट थी. इसे बाहर निकालने का काम रणसुभे जी ने किया और 'स्त्री विमर्श: अवधारणा और स्वरुप' का सृजन हुआ.  अल्पावधि में विशेषज्ञ विद्वानों की मिली प्रतिक्रियाओं ने मेरा हौसला और विश्वास बढ़िया. इस प्रकार की पुस्तक मराठी में भी होनी चाहिए ऐसा फिर रणसुभे जी ने तो कहा ही पर इस विषय के गहन अध्येता और तीनों भाषाओं पर प्रभुत्व रखनेवाले  विद्वान प्राध्यापक दिलीप चव्हाण ने भी कहा. फिर इस किताब का मराठी में पुनर्लेखन किया. 18 जनवरी 2025 को इन्हीं तीन किताबों का प्रकाशन एवं लोकार्पण रमा जी के  लिए बहुत खुशी की बात है। सुधी पाठक , साहित्य प्रेमी,चिंतक तथा समीक्षक इन पुस्तकों का स्वागत करेंगे इसी उम्मीद के साथ वाणी को विराम देता हूं…

 

डॉ गोविंद गुंडप्पा शिवशेट्टे

सहयोगी प्राध्यापक,

हिंदी विभाग, 

महाराष्ट्र महाविद्यालय,निलंगा

दूरभाष-9423909705

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